Friday, 15 November 2013

दबे दबे से  एहसास के साथ उठ रहे थे हमारे पाँव ,
एक नई मंजिल की तलाश में छोड़ रहे थे जब गाँव 
मुड मुड कर देख रहे थे बार बार ,
                एक पीड़ा संग छोड़ रहे थे घर बार ..
सोचकर आने वाले  कल को आँखे चमचमाती, 
देखकर आज को फिर यह क्यूँ  नम सी जाती.
आसमां को सर पे रखे ,
पहाड़ की उन वादियों में न जाने क्या मिठास था,
जहाँ को जो बंझर लगे ,
उन्ही घाटियों में सवर्ग का एक एहसास था ..
अन्दर से दिल था आज कुछ ज्यादा परेशान,
हुए हैरान क्यूँ है फिर होंठों पे यह मुस्कान..
बने रहे हम अपने आपसे यूंह ही अनजान 
पड़े रहे हम भी  जैसे  हर एक  इंसान !!!!